भारत में शिक्षा का निजीकरण: AIDSO का विरोध

बेंगलुरु, 22 अगस्त 2025 — भारत में शिक्षा क्षेत्र हमेशा से ही बहस और सुधार का केंद्र रहा है। हाल के दिनों में निजीकरण की आहट ने इस बहस को और तेज़ कर दिया है। इसी क्रम में बेंगलुरु में ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIDSO) ने बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया। संगठन का कहना है कि सरकार धीरे-धीरे सरकारी स्कूलों को कमजोर कर निजी शिक्षा को बढ़ावा दे रही है, जिससे लाखों गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार प्रभावित होंगे।

AIDSO का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से सरकार की नीतियों ने सरकारी स्कूलों की हालत बिगाड़ दी है। शिक्षकों की भारी कमी, अधूरी आधारभूत सुविधाएँ और स्कूलों के विलय जैसे कदमों ने बच्चों को शिक्षा से दूर कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और भी खराब हैं। संगठन के अनुसार, केवल कर्नाटक ही नहीं बल्कि पूरे देश में लगभग 50,000 से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। संगठन का कहना है कि सरकार का उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र से अपनी ज़िम्मेदारी हटाना है। संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि शिक्षा पर बजट का प्रतिशत पिछले कुछ वर्षों में घटा है और जो योजनाएँ लाई जा रही हैं, वे अधिकतर निजी क्षेत्र को लाभ पहुंचाने के लिए हैं।

21 अगस्त को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में हजारों की संख्या में छात्र, अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठा हुए। प्रदर्शनकारियों ने तख्तियाँ और बैनर लेकर नारे लगाए—“शिक्षा बिकाऊ नहीं है”, “सरकारी स्कूल बचाओ, देश का भविष्य बचाओ।” छात्र नेताओं ने मंच से कहा कि शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, न कि कोई व्यापार। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने निजीकरण की नीति वापस नहीं ली, तो यह आंदोलन राज्य से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर फैल जाएगा।

इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि AIDSO ने 50 लाख से अधिक नागरिकों के हस्ताक्षर वाला माँग पत्र सरकार को सौंपा। इस पत्र में साफ़ लिखा गया है कि सरकारी स्कूलों में खाली पड़े शिक्षकों के पद तुरंत भरे जाएँ, स्कूलों को मर्ज करने की नीति बंद की जाए, शिक्षा पर GDP का कम से कम 6% खर्च किया जाए और निजीकरण की किसी भी नीति को तुरंत रद्द किया जाए। AIDSO नेताओं का कहना है कि यह माँग पत्र आम जनता की आवाज़ है, जिसे सरकार अनदेखा नहीं कर सकती।

निजीकरण के विरोधियों का कहना है कि शिक्षा का बाज़ार बन जाने से गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ाई से वंचित हो जाते हैं। निजी स्कूलों की फीस लगातार बढ़ रही है और यह मध्यम वर्ग के लिए भी असहनीय हो चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूल ही एकमात्र विकल्प होते हैं। निजी स्कूलों का जाल शहरों तक सीमित है और शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून तभी प्रभावी हो सकता है जब सरकारी स्कूल मज़बूत हों। AIDSO के एक प्रवक्ता ने कहा—“सरकार का दायित्व है कि वह हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा दे। लेकिन जब सरकार खुद ही अपने स्कूलों को कमजोर करती है और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करती है, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ है।”

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि स्कूलों का विलय बच्चों की संख्या में गिरावट की वजह से किया जा रहा है। कई स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत कम है, जिससे संसाधन बर्बाद हो रहे हैं। सरकार का तर्क है कि विलय से संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और बच्चों को अधिक सुविधाएँ मिलेंगी। हालाँकि आलोचकों का कहना है कि छात्रों की संख्या कम होने का असली कारण शिक्षकों और सुविधाओं की कमी है। यदि सरकार समय पर शिक्षकों की नियुक्ति करे और स्कूलों का ढांचा सुधारे, तो दाखिले अपने आप बढ़ जाएंगे।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव है। प्रो. अनिरुद्ध देसाई का कहना है कि—“सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बचाना केवल गरीबों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की रक्षा का भी सवाल है। निजीकरण शिक्षा को वर्ग आधारित बना देगा।” कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि निजी स्कूलों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सरकारी शिक्षा को कमजोर कर देना सही समाधान नहीं है।

निजीकरण की नीति का सबसे गहरा असर उन बच्चों पर पड़ता है जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। कई बार बच्चे स्कूल छोड़कर मज़दूरी करने लगते हैं। ग्रामीण और दूर-दराज़ क्षेत्रों में लड़कियाँ सबसे पहले शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। सामाजिक असमानता और भी गहरी हो जाती है।

AIDSO ने घोषणा की है कि यह केवल शुरुआत है। आने वाले दिनों में राज्यभर में पदयात्राएँ और जनसभाएँ आयोजित की जाएँगी। साथ ही, संगठन ने केंद्र सरकार से भी अपील की है कि राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा को निजीकरण से बचाने की ठोस नीति बनाई जाए। दूसरी ओर, सरकार के लिए यह आंदोलन एक चेतावनी है। यदि शिक्षा को लेकर जनता का आक्रोश बढ़ा, तो यह एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभर सकता है।

बेंगलुरु का यह प्रदर्शन केवल एक राज्य या एक संगठन का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए संकेत है। सरकारी स्कूल भारत की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। इन्हें कमजोर करना देश के भविष्य को कमजोर करने जैसा है। यदि सरकार और समाज समय रहते मिलकर इस चुनौती का समाधान नहीं ढूँढते, तो आने वाली पीढ़ियाँ शिक्षा से वंचित रह जाएँगी और देश की प्रगति की रफ़्तार धीमी हो जाएगी।